Monday, November 8, 2010

धर्मो रक्षति रक्षितः

जो धर्म की रक्षा करता है वह स्वयं रक्षित होता है।
इस उद्घोष का कोई तो कारण होगा। आखिर क्यों हमारी संस्कृति में धर्म को इतना महत्व दिया गया है। धर्म का क्या अर्थ है? क्या सच्चरित्रता धर्म है? क्या नैतिकता धर्म है? क्या पूजा धर्म है? ऐसे ना जाने कितने प्रश्न हमें घेरे रहते हैं।
असल में धर्म वह धरती है जिस पर चरित्र, विवेक, शील, नैतिकता और कर्तव्यपरायणता आदि जैसे गुण विकसित होते हैं। यदि धर्म का आधार न हो तो इन गुणों का भी कोई अस्तित्व न हो। धर्म एक संस्कृत शब्द है जिसका आज तक किसी अन्य भाषा में अनुवाद नहीं हो पाया। यह केवल और केवल भारतीय संस्कृति का ही अंग रहा है। आमतौर पर लोग इसका अंग्रेज़ी अनुवाद रिलीजन के रूप में करते हैं, किन्तु यह उससे कहीं अधिक व्यापक है। धरती जितना विस्तारित, या शायद उससे भी अधिक। इसकी कोई सीमा नहीं और यदि है तो उस सीमा के बाहर कुछ भी नहीं।
धर्म के बिना जीवन का कोई अस्तित्व नहीं। धरा का प्रत्येक जीव धर्म से बंधा है। नदी का धर्म है उपर से नीचे की ओर बहना। यदि वह अपने इस धर्म का पालन न करे तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। वह झील या सरोवर होकर रह जायेगी। प्रकृति, मनुष्य, पालन, पोषण, जन्म-मृत्यु, जीव, वनस्पति आदि सभी धर्म से संचालित हैं।
सरल शब्दों में कहें तो जीवन का विधान ही धर्म है। देश को चलाने के लिए कानून की आवश्यकता होती है। यहाँ तक कि छोटी से छोटी इकाई को चलने के लिए भी नियम होते हैं। इन नियमों के बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं। ठीक इसी प्रकार जीवन को चलाने के लिए भी नियम की आवश्यकता होती है। जीवन के यह नियम ही धर्म है। आप जिस भी रूप में जीवन को पायें, आपके लिए कुछ नियम होंगे। आप उन नियमों का पालन करते हैं तो धर्मी हैं, नहीं करते तो अधर्मी।
अगला प्रश्न जो मन में आता है, वह है कि कैसे जानें धर्म क्या है? तो उसका उत्तर है कि समय-समय पर महापुरुषों का आचरण ही धर्म को प्रकट करता है। स्वामी विवेकानंद एक महात्मा ना रहकर आज एक विचार बन चुके हैं। आचार्य शंकर एक व्यक्ति ना रहकर परम्परा बन चुके हैं। धर्मराज युधिष्ठिर से पूछे गये यक्ष प्रश्नों में एक यह भी था – कः पन्थः? रास्ता क्या है? तब धर्मराज उसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि धर्म तत्व गहन है। इसे महापुरुषों के आचरण से ही समझा जा सकता है। महापुरुष जिस मार्ग पर चले कालांतर में वही धर्म हो गया। रामः विग्रह्धर्मः। राम स्वयं धर्मविग्रह हैं।
धर्म शाश्वत है। व्यक्ति विशेष के विचार और देश काल से यह प्रभावित नहीं होता। यह परिवर्तनशील नहीं है। धर्म का आधार श्रद्धा एवं विश्वास है। तर्क-वितर्क से परे हटकर हमें मनीषियों और महापुरुषों के आचरण से प्रेरणा प्राप्त कर धर्मपूर्वक आचरण करना चाहिये क्योंकि – ‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनं’

13 comments:

  1. आदरणीया
    महापुरुष जिस मार्ग पर चले कालांतर में वही धर्म हो गया।
    सत्य वचन हैं.
    - विजय तिवारी 'किसलय'

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  2. मुझे तो बहुत गूढ़ लगता है..

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  3. 'धर्म का आधार श्रद्धा एवं विश्वास है। तर्क-वितर्क से परे हटकर हमें मनीषियों और महापुरुषों के आचरण से प्रेरणा प्राप्त कर धर्मपूर्वक आचरण करना चाहिए।'-बहुत सही बात कही आपने। श्रद्धा एवं विश्वास ही धर्म की रीढ़ होते हैं। जय हो।

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  4. राजू जी, विजय जी और भारतीय नागरिक,अमूल्य समय देने के लिए आपको धन्यवाद

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  5. Many of us believe that DHARMA and religion are equivalent words but it's not true. Religion is nothing but a belief of an individual person in so called GOD and their miracles, such persons support blindly the existence and miracle of a super natural power. Every religious person suppose and believe that their way of pray or rituals are true and believes of others wrong, they often quarrel on these trivial issues. The present situation of World wide terrorism and hatred is due to these so called religions.In recent years the orthodoxism and fundamentalism growing up unexpectedly. The great thinker, Karl Marks, had truly said that religion is opium. I my opinion the so called religions are much dangerous than the opium.
    Now I come on main topic, what is the DHARMA? In my theory the life is consists of two things one is the hardware and other is the system software. The system software i.e. the operating system is installs or develops very first in the womb of the mother just after manufacturing the hardware required for it. After the birth the brain got its Application Software naturally from society,study,experience, thinking and so many these like processes. The DHARMA is also an application software which developed itself by what we call 'SANSKAR', study and experience and installs in the brain and works as an anti virus to prevent the system software and other application softwares from the viruses produced by the society and their ecosystem.Thus 'Dharma' is just opposite of religion. In fact, DHARMA is matter of bearing while the religion is a type of believe.
    In Mahabharat(Shanti parv) it is quoted " saa dharyati, ta dharmah"i.e. Dharma is a matter of bearing and also that " Mahajano gatva supanthah" i.e. to say, follow thte geat personalities. Thus my theory is also endorsed from here.
    Dear friends, my theory of life is completely based on scientific evidences and logic. An orthodox can not compatible with my view as he/she has sealed his/her mind and unable to think more than a compact thing i.e. religion.

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  6. Dharma can not be describe as so called 'shraddha & visvas. In fact 'Shraddha & Visvas' generate blind belief and it is much near to a religion and tradition.In Holy book Geeta,Lord says,"Aham gyani priyam, gyaninam ch mam priyam" which just implies that logic and intelligence are excellent. Thus "tark-vitark" is much near to dharma rather than " Shraddha & Visvas".The the ultimate knowledge of Upnishads are" Gyan, Daman(Indriy nigrah) and Dan(Apridrah).Then, how can shraddha & visvas be Dharma.

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  7. Respected Sadhvi ji, My Hindi typing speed is too poor.So, please do'nt take it otherwise and not delete my comments.

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  8. "धर्मो रक्षति रक्षितः
    जो धर्म की रक्षा करता है वह स्वयं रक्षित होता है।",The statement is undoubtedly most true but we hsve to anderstand what is Dharma?

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  9. Replies
    1. धर्म जो हाम धारण करते है ! जो हामारा दिल हामे स्वीकृत देता है हामारा दिल आत्मा हामे ओ काम सहि लेगते है ओहि धर्म है! ये मेरा पर्सनल बिचार है

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  10. साध्वी जी , धन्यवाद

    जाई श्री कृष्णा

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  11. शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
    ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌।
    रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
    वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥

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  12. Dharm ek jeevan vidhi hai, Aapaki yah baat aur anya sabhi baat bilkul satya hai, Aapaka hardik aabhari hun. Aapako sadar Pranam.

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